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आतंकवाद, जन्नत और बहत्तर हूरें

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​​आतंकवाद, जन्नत और बहत्तर हूरें

पूरी दुनिया में आतंकवाद अपने चरम पर है। सीरिया, लीबिया, मिश्र,इराक,नाइजीरिया,सोमालिया,पाकिस्तान से लेकर यूरोप और अमेरिका तक आंतकवाद अपना असर दिखा रहा है। और इन सबकी जड़ है वहाबी इस्लामिक विचारधारा। मगर क्या सिर्फ वहाबी विचारधारा को ही दोष देकर हम मूल कारण को नजरअंदाज नहीं कर रहे। क्योंकि मूल कारण है इस्लाम का शैक्षणिक ढांचा । जो एक किताब में लिखे हर शब्द को पत्थर की लकीर मानता है। उस पर हर मौलवी अपने हिसाब से अर्थ का अनर्थ निकल कर कभी तालिबान तो कभी आई एस आई एस को जन्म दे देता है। मजहबी किताबों में दर्ज जन्नत सभी मुसलमानों के लिए एक ऐसी मंजिल बन गई कि युवक उसके लिए जान देने को तैयार हैं। क्योंकि जिहाद के लिए जान देने पर उनको जन्नत देने का वादा किया गया है। और जिहाद क्या है? काफिरों यानि विधर्मियों के खिलाफ धर्मयुद्ध का नाम ही जिहाद है। तो फिर विधर्मी कौन है। इस्लाम को न मानने वाला विधर्मी है। और खासतौर पर मूर्तिपूजा करनेवाला सबसे बड़ा काफिर है। यानि हम हिन्दू, बौद्ध या जैन। इन काफिरों के खिलाफ जिहाद में मरने वाले को अल्ला जन्नत देगा। और जन्नत में क्या है जो उसके लिए जान दी जा रही है। जन्नत में वादा है 72 हूरों का, जो जिहादी को ऐश कराएंगी। इन्ही 72 हूरों के लिए मुस्लिम युवा जान देने को आतंकवादी बन रहे हैं। वैसे युवतियां भी आतंकवादी बन रही हैं। युवकों को अगर 72 हूरें मिलेंगी तो युवतियों को क्या मिलेगा, 72 पहलवान या फ़िल्मी हीरो। इस पर मौलवी खामोश हैं। आखिर औरत उनके लिए पाँव की जूती जो है। उसको जान देने के बाद जन्नत तो मिलेगी मगर ऐश नहीं मिलेगी। क्योंकि ऐश पर तो इस्लाम के मुताबिक मर्दों का ही एकाधिकार है। तो भाई जब तक इस्लाम जन्नत व् ह्यूरोन के घटिया विचार को ख़ारिज नहीं करता तब तक आंतकवाद सिर्फ चलता ही नहीं रहेगा बल्कि बढ़ता रहेगा। मगर जन्नत व् हूरों के विचार को ख़ारिज करने का साहस किसी माई के लाल में नहीं है। तो झेलते रहिए आतंकवाद, जब तक मुसलमान सच नहीं स्वीकारेंगे, तब तक खुद भी बर्बाद होते रहेंगे दुनिया को भी बर्बाद करते रहेंगे।

कसाब जब फांसी के बाद ईश्वर के पास पहुंचा तो उसे जन्नत या 72 हूरें मिली या…. जानने के लिए देखिए ये वीडियो

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