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अरुणाचल पर चीन की दादागिरी

PM Modi & Chinese President Xi

अरुणाचल पर चीन की दादागिरी

चीन हमेशा विदेशनीति में आक्रामक तेवर रखता है। उसकी नीति है कि सामने वाले को हमेशा रक्षात्मक रवैया अपनाने के लिए मजबूर करो। उसके सभी पड़ोसी ऐसा करने के लिए मजबूर हैं। भारत भी पिछले 70 सालों से यही करता आ रहा है। नेहरू ने पचास के दशक में जो चीन के आगे घुटने टेके, तो आज तक भारत चीन के सामने घुटने के बल ही खड़ा है। लेकिन चीन है क़ि इस पर भी संतुष्ट नहीं दिखता। वो चाहता है कि भारत उसके सामने दण्डवत लेट जाए। और इसके लिए वो कोई न कोई मौका ढूंढता रहता है। और उसे मौका भी मिल जाता है।

दलाई लामा अरुणाचल के दौरे पर जा रहे हैं। चीन भारत को घुड़की दे रहा है। जबकि दलाई लामा कोई पहली बार अरुणाचल नही जा रहे हैं। वो विगत में पांच छः बार अरुणाचल जा चुके हैं। हर बार चीन ऐतराज करता है, और हर बार भारत चुप रहता है, दलाई लामा अरुणाचल जाते हैं और लौट आते हैं। मगर चीन बाज
नहीं आता। सवाल ये है क़ि चीन ऐसा करता क्यों है, वो इसलिए क्योंकि चीन चाहता है क़ि भारत हमेशा दबाव में रहे। अरुणाचल पर उसका दावा बना रहे। और भारत उससे डरा रहे।

चीन की सीनाजोरी देखिए, खुद तो वो पी ओ के में भारी निर्माण कर रहा है, जबकि दुनिया जानती है कि पी ओ के भारत का भाग है। मगर चीन एशिया का दादा है। मेरी मर्जी के सिद्धान्त पर चलता है। एक तरफ तो वो तिब्बत और सिंजयांग के अलगाववादियों को सख्ती और क्रूरता से कुचलता है। और दूसरी तरफ पाकिस्तान के आतंकियों को सुरक्षा परिषद में बचाता है। कश्मीर और अरुणाचल के लोगों को स्टेपल वीसा देता है। भारत असहाय खड़ा रह जाता है। 1962 से आज तक भारत चीन के मामले में वहीं खड़ा नजर आता है।

लेकिन उम्मीद है कि पहली बार एक कट्टर राष्ट्रवादी मोदी के सत्ता में आने के बाद भारत के रुख में कुछ कड़ाई आयगी। क्या भारत चीन के साथ आँख मिलाकर बात करेगा? ये तो समय ही बताएगा, मगर भारत चाहे तो चीन के साथ तिब्बत और सिंक्यांग का मामला कश्मीर की तुलना में उठा सकता है। क्योंकि चीन को रक्षण के लिए मजबूर करने ही भारत की नीति का मुल्है अंग होना चाहिए। भारत को निसंकोच सिंक्यांग और तिब्बत के लोगों को भी स्टेपल वीसा देना चाहिए। ध्यान रहे चीन गीदड़ भभकी देने के सिवाय कुछ नही कर सकता। वैसे भी उसकी इकॉनमी ढलान पर है। वो कभी युद्ध का जोखिम आज उठाने की स्थिति में नहीं है। भारत को अविलंब चीन को लोकतंत्र और मानवाधिकार के मुद्दे पर घेरने की शुरुआत करनी चाहिए। जिस दिन भारत चीन से बचने की बजाय सामना करना शुरू कर देगा, उस दिन से चीन भारत को गम्भीरता से लेना शुरू कर देगा।

आशा करते हैं कि मोदी सरकार भारत की विदेशनीति में आक्रामकता लाएगी, और चीन को ईंट का जवाब पथर से देगी।

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