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आदि शंकराचार्य- आधुनिक हिन्दू धर्म के संस्थापक

adi shankaracharya

आदि शंकराचार्य का जन्म 788 ईस्वी में केरल के एक छोटे से ग्राम कल्लरी में हुआ था। बालपन में ही उनके पिता का देहांत हो गया था। उनकी विधवा माता का वो अंतिम सहारा थे। मगर बालक शंकर दस वर्ष की आयु से ही सन्यास की जिद करने लगा। माँ ने हर कोशिश करके देख लिया, मगर शंकर नहीं माना। अंततः माँ को अनुमति देनी पड़ी और शंकर सन्यासी हो गया। युवा होते ही शंकर का नाम पुरे भारत में फ़ैल गया। और वे शंकराचार्य कहलाने लगे। काशी में उन दिनों विद्वानों की एक विद्वत परिषद होती थी। उस परिषद के सामने उन्होंने काशी के प्रख्यात विद्वान् मण्डन मिश्र को शास्त्रार्थ में पराजित किया। मण्डन मिश्र उनके शिष्य हो गए। शंकराचार्य के समय में बौद्ध मत पुरे भारत में स्थापित हो गया था। शंकराचार्य ने सनातन संस्कृति की पुनर्स्थापना की। उन्होंने हिन्दू धर्म को संगठित किया। और अखाडों की स्थापना की। पुरे भारत में धार्मिक एकता के लिए उन्होंने भारत के चारों कोनों में चार मठों और चार धामों की स्थापना की। पूर्व में पूरी में जगन्नाथ, पश्चिम में द्वारका, उत्तर में बद्रीनाथ और दक्षिण में रामेश्वरम। 830 इशवि में केदारनाथ में उनकी मृत्यु हो गई। उनके जाने के बाद भारत में कई झंझावत आये। कई आक्रमण हुए। भारत 1000 वर्ष तक गुलाम रहा, करोड़ों लोगों ने इस्लाम या ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया। यहां तक की भारत के टुकड़े हो गए। पाकिस्तान और बांग्लादेश अलग हो गए। मगर शंकराचार्य द्वारा स्थापित चारों मठ भारत की सीमा में ही रहे। और हिन्दू धर्म इन चारों मठों की परिधि में सुरक्षित है। 32 वर्ष की अल्पायु में ही शंकराचार्य का देहांत हो गया था, मगर इस अल्पायु में ही वे दो बार भारत का भ्रमण कर चुके थे। आज भी पूरा हिन्दू समाज उनके द्वारा स्थापित चार धामों का अपने जीवन में एक बार दर्शन जरूर करना चाहता है।

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